तीसरे दिन की कथा – नारद मोह व मनु-शतरूपा प्रसंग
राम कथा के तीसरे दिन नारद मोह व मनु-शतरूपा तप का प्रसंग, भक्तों को मिला अहंकार त्याग का संदेश
परशदेपुर तीसरे दिन की कथा – नारद मोह व मनु-शतरूपा प्रसंग*
राम कथा के तीसरे दिन नारद मोह व मनु-शतरूपा तप का प्रसंग, भक्तों को मिला अहंकार त्याग का संदेश
परशदेपुर, रायबरेली।* बूढ़ी माता मंदिर, पछुआबारा में चल रही नव दिवसीय संगीतमय श्रीराम कथा के तीसरे दिन शुक्रवार,29 मई 2026 को नारद मोह एवं मनु-शतरूपा की तपस्या प्रसंग का वर्णन किया गया। कथा व्यास पूज्य धर्मेश हरि महाराज जी ने बताया कि देवर्षि नारद को एक बार अपने तप और ब्रह्मचर्य पर अहंकार हो गया था। कामदेव को जीतने के गर्व में नारद भगवान विष्णु के पास पहुंचे। भगवान ने उनकी माया रची। नारद को रास्ते में एक सुंदर नगर दिखा, जहाँ राजा की कन्या स्वयंवर कर रही थी। नारद उस पर मोहित हो गए और भगवान से हरि जैसा सुंदर मुख माँगा। भगवान ने उन्हें वानर का मुख दे दिया। स्वयंवर में सभी नारद को देखकर हंसने लगे। जब सत्य पता चला तो नारद को बहुत क्रोध आया, पर बाद में भगवान की लीला समझकर उनका अहंकार टूट गया। इसके बाद मनु-शतरूपा प्रसंग सुनाया गया। सृष्टि के प्रथम राजा मनु और रानी शतरूपा ने पुत्र की इच्छा से घोर तप किया। उनके तप से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने वर दिया कि वे स्वयं उनके पुत्र रूप में अवतरित होंगे। वही मनु-शतरूपा अगले जन्म में दशरथ-कौशल्या बने। कथा सुनकर श्रद्धालु भाव-विभोर हो गए।ये प्रसंग बताता है कि भक्ति में सबसे बड़ा शत्रु अहंकार है। हम कितने भी बड़े तपस्वी क्यों न हों, भगवान की माया से कोई नहीं बच सकता। नारद मोह सुनने से मनुष्य का अहंकार गल जाता है,और वो विनम्र हो जाता है कथा सुनने वाला अहंकार छोड़ता है और प्रेम जोड़ता है। नारद बनकर टूटता है, मनु बनकर जुड़ता है। रायबरेली।* बूढ़ी माता मंदिर, पछुआबारा में चल रही नव दिवसीय संगीतमय श्रीराम कथा के तीसरे दिन शुक्रवार,29 मई 2026 को नारद मोह एवं मनु-शतरूपा की तपस्या प्रसंग का वर्णन किया गया। कथा व्यास पूज्य धर्मेश हरि महाराज जी ने बताया कि देवर्षि नारद को एक बार अपने तप और ब्रह्मचर्य पर अहंकार हो गया था। कामदेव को जीतने के गर्व में नारद भगवान विष्णु के पास पहुंचे। भगवान ने उनकी माया रची। नारद को रास्ते में एक सुंदर नगर दिखा, जहाँ राजा की कन्या स्वयंवर कर रही थी। नारद उस पर मोहित हो गए और भगवान से हरि जैसा सुंदर मुख माँगा। भगवान ने उन्हें वानर का मुख दे दिया।

स्वयंवर में सभी नारद को देखकर हंसने लगे। जब सत्य पता चला तो नारद को बहुत क्रोध आया, पर बाद में भगवान की लीला समझकर उनका अहंकार टूट गया। इसके बाद मनु-शतरूपा प्रसंग सुनाया गया। सृष्टि के प्रथम राजा मनु और रानी शतरूपा ने पुत्र की इच्छा से घोर तप किया। उनके तप से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने वर दिया कि वे स्वयं उनके पुत्र रूप में अवतरित होंगे। वही मनु-शतरूपा अगले जन्म में दशरथ-कौशल्या बने। कथा सुनकर श्रद्धालु भाव-विभोर हो गए।ये प्रसंग बताता है कि भक्ति में सबसे बड़ा शत्रु अहंकार है। हम कितने भी बड़े तपस्वी क्यों न हों, भगवान की माया से कोई नहीं बच सकता। नारद मोह सुनने से मनुष्य का अहंकार गल जाता है,और वो विनम्र हो जाता है कथा सुनने वाला अहंकार छोड़ता है और प्रेम जोड़ता है। नारद बनकर टूटता है, मनु बनकर जुड़ता है।
मंडल ब्यूरो चीफ पवन श्रीवास्तव की रिपोर्ट
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